
संस्कारों का हिंदू जीवन पद्धति में बहुत महत्व है। देश की उन्नति नेताओं की बजाय आम लोगों के श्रेष्ठ संस्कारों से ही होती है। इसमें परिवार के साथ विद्यालय की भी बड़ी भूमिका है। मुस्लिम हमलावरों ने विद्यालय तोड़े तथा पुस्तकें जलाईं, पर अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा और संस्कार प्रणाली के प्रति घृणा भर दी। इसलिए हम आज भी मानसिक रूप से उनके गुलाम ही हैं। शाखा के कार्यक्रमों से स्वयंसेवक के मन पर अच्छे संस्कार पड़ते हैं; पर समाज के बाकी लोगों, विशेषकर नई पीढ़ी को संस्कार देने के लिए स्वयंसेवकों ने कई संस्थाएं बनाई हैं। इनका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणाम सर्वत्र दिख रहा है।
इसके लिए प्रमुख कार्य 1952 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से शुरू हुआ, जिसे अब ‘विद्या भारती’ कहते हैं। इसके अंतर्गत प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय तक की शिक्षा अलग-अलग दी जाती है। हर राज्य में इसके लिए अलग समितियां हैं। इनसे लाखों बच्चे, अध्यापक, अभिभावक और समाजसेवी ‘शैक्षिक परिवार’ के नाते जुड़े हैं। इससे बच्चों के साथ उनके जीवन भी बदले हैं। अतः वनवासी क्षेत्रों में कन्वर्जन तथा सीमांत क्षेत्रों में उग्रवादी आंदोलन
रुके हैं। अपराधों में सक्रिय लोगों ने भी गलत काम छोड़े हैं।
इनमें शिक्षा स्थानीय भाषा और बोली में दी जाती है। यद्यपि अब कई जगह, विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में अंग्रेजी माध्यम हो गया है; पर वंदना, ध्यान, आसन, व्यायाम, खेल आदि के माध्यम स्थानीय ही हैं। हर विद्यालय निकटवर्ती निर्धन बस्तियों में कुछ संस्कार केन्द्र चलाता है। समय-समय पर छात्रों और अध्यापकों के शिविर तथा प्रशिक्षण के कार्यक्रम भी होते हैं। नगरीय, ग्रामीण, वनवासी तथा उच्च शिक्षा के संचालन हेतु कई शोध संस्थान बने हैं। संस्था द्वारा संचालित ‘संस्कृति ज्ञान परीक्षा’ हजारों अन्य विद्यालयों में भी होती है। पूर्वोत्तर भारत के लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग सैकड़ों छात्रावास भी देश भर में चल रहे हैं।
ऐसा ही दूसरा बड़ा काम ‘सेवा भारती’ का है। इसके लिए भी हर राज्य में अलग संस्थाएं बनी हैं। ये मुख्यतः हिंदू समाज के निर्धन और निर्बल वर्ग में काम करती हैं। स्थानीय जरूरत के अनुसार बालवाड़ी, संस्कार केंद्र, सिलाई-कढ़ाई केंद्र, चिकित्सालय, रात्रि पाठशाला, कीर्तन मंडली, वाचनालय, छात्रावास, मंदिर आदि खोले गए हैं। ऐसी बस्तियों में नशा और झगड़ा आम बात है; पर इन केंद्रों के कारण बच्चों और बड़ों की आदतें बदली हैं। अतः शिक्षित और समृद्ध वर्ग का दृष्टिकोण भी इनके प्रति ठीक हुआ है।
‘एकल विद्यालय’ उन गहन ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में पहुंचे हैं, जहां सरकार भी पढ़ाने नहीं जाती। गांव में आसपास का ही कोई युवा छोटे बच्चों को पढ़ाता है। पढ़ाई के साथ कुछ संस्कार भी दिए जाते हैं। शहरों के धनपति इनका खर्च उठाते हैं। ऐसे केंद्रों की संख्या 1,50,000 से भी अधिक है। इनके अध्यापक शिक्षा और संस्कार के साथ आरोग्य, ग्राम विकास, जन जागरण, जैविक खेती, गो संरक्षण आदि में भी सक्रिय रहते हैं।
शिक्षा में भारतीयकरण के लिए 1960 में ‘भारतीय शिक्षण मंडल’ का गठन हुआ। संस्था ने सैकड़ों गोष्ठियां कीं तथा 2,000 शिक्षाविदों से मिलकर शिक्षा का राष्ट्रीय प्रारूप तथा पाठ्यक्रम बनाया। संस्था का मत है कि शिक्षा में अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक जैसा भेद नहीं होना चाहिए। ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ भी सच्चे और गौरवशाली इतिहास को सामने ला रही है। सरस्वती नदी पर शोध इस संस्था का विशिष्ट प्रकल्प है।
कला सबके मन को छूती है। 1981 में गठित ‘संस्कार भारती’ ने लाखों छोटे-बड़े कलाकारों को जोड़ा है। संस्था का मानना है कि रंगोली, काव्य, लोकगीत एवं संगीत, नृत्य, नाटक, मूर्ति, चित्र, फिल्म, फोटोग्राफी.. अर्थात कला की हर विधा संस्कार दे सकती है। कलाकारों की सैकड़ों संस्थाएं संस्कार भारती से सम्बद्ध हैं। हर जाति, वर्ग, आयु और पंथ के कलाकार निःसंकोच इसके मंच पर आते हैं।
ज्ञान और विज्ञान से भरपूर संस्कृत को अंग्रेजों ने एक मृत भाषा के रूप में प्रचारित किया। संस्कृत भारती, भारत संस्कृत परिषद, विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान आदि संस्थाएं पत्राचार तथा संभाषण कक्षाओं द्वारा इसके पुनर्जीवन में लगी हैं। अब तक 80,000 अध्यापक तैयार हो चुके हैं। इनमें सभी जाति, वर्ग, आयु और पंथो के लोग हैं। 16 अन्य देशों में भी इनका काम है। पत्रिका ‘भारती’ तथा ‘संभाषण संदेश’ बहुत लोकप्रिय हैं। अंतरजाल (इंटरनेट) भी संस्था के प्रसार में सहायक है। 2011 में बेंगलुरू का ‘विश्व संस्कृत पुस्तक मेला’ बहुत सफल हुआ। संस्था की मांग है कि विद्यालयों में संस्कृत विषय को संस्कृत माध्यम से ही पढ़ाया जाए।
1992 में स्थापित ‘क्रीड़ा भारती’ का मत है विद्यालयों में खेल होने जरूरी हैं। खेल भावना बढ़ाने के लिए महंगे विदेशी खेलों की बजाय कबड्डी, खो-खो, साइकिल दौड़, सूर्य नमस्कार जैसे स्थानीय और मिट्टी से जुड़े खेलों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। वनवासी बच्चे परंपरागत खेलों में माहिर होते हैं। उनके लिए संस्था प्रशिक्षण शिविर तथा वनवासी क्रीड़ा प्रतियोगिता करती है। संस्था खिलाड़ियों के साथ उनके प्रशिक्षक और अभिभावकों को भी सम्मानित करती है।
2004 में ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ तथा ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान’ जैसे काम शुरू हुए। दुर्भाग्यवश हमें अपने गौरव की बजाय गुलामी और पराजय का इतिहास अधिक पढ़ाया जाता है। इस बारे में आजादी के बाद कई आयोग बने; पर उनके सुझाव लागू नहीं हुए। संस्था वैदिक गणित, जनजातीय शिक्षा, पर्यावरण शिक्षण, नैतिक एवं मूल्यपरक शिक्षा, भाषायी शुद्धता, दीक्षा कार्यक्रमों के भारतीयकरण आदि की दिशा में काम कर रही है।
‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ भारत का सबसे बड़ा छात्र संगठन है। इसका मत है कि विद्यार्थी कल का ही नहीं, आज का भी नागरिक है। अतः पढ़ाई के साथ अधिकारों की लड़ाई भी जरूरी है। छात्रों में शिक्षा के साथ ही संस्कारों को बढ़ाने के लिए विद्यालयों के अंदर तथा बाहर कई कार्यक्रम किए जाते हैं। इसी के बल पर उसने कई संकट और चुनौतियों का सामना किया है। इनमें विद्यालयों में छात्रों की सुविधाओं के लिए हुए प्रयासों के साथ ही आपातकाल, कश्मीर, असम एवं पंजाब समस्या, मराठा विद्यापीठ नामांतरण आदि के लिए हुए आंदोलन उल्लेखनीय हैं। परिषद शिक्षा के भारतीयकरण की समर्थक तथा उसके व्यापार की विरोधी है। उसका मत है कि जनजातीय तथा बालिका शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
इन कार्यों में हजारों अन्य संस्थाएं भी सहयोग करती हैं। संघ उन्हें भी पूरा सम्मान देता है।
(Courtesy: Panchjanya)