शहीद बेटे की प्रतिमा को हर सर्दी कंबल ओढाती मां… कहानी आंखों को नम कर देगी

VSK Telangana    12-Jan-2026
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 Martyr Gurnam Singh statue
 
 

नई दिल्ली/जम्मू: जम्मू-कश्मीर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक मां ने अपने शहीद बेटे को सर्दी से बचाने के लिए उसकी प्रतिमा को कंबल ओढाया है। वीडियो ने लाखों लोगों की आंखों को नम कर दिया है और एक बार फिर से उस शहीद की बहादुरी को याद दिला दिया है। वैसे भी शहीद कभी मरा नहीं करते हैं.. वो अमर हो जाते हैं- स्मृतियों में और इतिहास में। उनके बलिदान को देश हर क्षण याद करता है। उनके बलिदान की बदौलत ही देश सुरक्षित है।

यह कहानी शहीद गुरनाम सिंह की है…
शहीद बेटे की प्रतिमा को कंबल ओढाने वाली मां जसवंत कौर हैं। ठंड बढ़ी तो उनको अपने बेटे की फिक्र हुई और उन्होंने बेटे की प्रतिमा को ही कंबल ओढ़ा दिया ताकि सर्दी न लगे। इसका वीडियो जब वायरल हुआ तो देश भावुक हो गया। यह मामला अर्निया (जम्मू) के एक चौक का है। जहां शहीद गुरनाम सिंह की प्रतिमा लगी है। मां जसवंत ने उस प्रतिमा को कंबल ओढाया तो इसका वीडियो देश के कोने-कोने तक जा पहुंचा। और यह संदेश भी जब लाडला ठंड से ठिठुरता है तो मां का कलेजा भी ठिठुर उठता है।

हर सर्दी अपने शहीद बेटे को ठंड से बचाती मां
शहीद गुरनाम सिंह की यह प्रतिमा साल 2021 में लगी थी। बताया जा रहा है कि साल 2022 से हर सर्दी उनकी मां कंबल लेकर अपने बेटे की प्रतिमा को ओढाती है। मां ऊनी कंबल लेकर शहीद बेटे की प्रतिमा के पास पहुंचती है और उसे ऊनी कंबल ओढा देती है। यह सिलसिला सालों से चला रहा है। इस बार भी ऐसा हुआ और इसका वीडियो वायरल हो गया।

2016 में गुरनाम सिंह ने पाक आतंकियों के घुसपैठ को किया था असफल
जसवंत कौर अपने बेटे से आखिरी बार उस समय मिली थी जब उसकी उम्र 26 साल थी। वह उस समय उनके शादी का सपना बुन रही थी। लेकिन बेटे ने देश की सुरक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया और यह साबित कर दिया कि सैनिक का पहला इश्क वर्दी और उसका देश है। मातृभूमि उसका पहला प्यार है और दुल्हन भी। यह 21 अक्टूबर 2016 की बात है। हीरानगर सेक्टर में घुसपैठ करते आतंकियों के लिए गुरनाम काल बन गए थे। उन्होंने एक आतंकी को ढेर किया और पाकिस्तान के घुसपैठ को असफल कर दिया था। 22 अक्टूबर 2016 को गोलियों से छलनी होने के बाद भी गुरनाम पीछे नहीं हटे और अंत में हमेशा के लिए भारत माता की गोद में सो गए। वह बीएसएफ की 173वीं बटालियन से थे। उनकी शहादत और वीरता को देश आज भी याद करता है।

 (Courtesy: Panchjanya)