
अपने-अपने प्रांत, पंथ-संप्रदाय और भाषा के साथ-साथ खान-पान तथा रीति-रिवाजों का पालन करते हुए जो लोग आध्यात्मिकता, विश्वबंधुत्व और मानवता की दृष्टि लेकर चलते हैं, उनके लिए हिंदू शब्द आया है। हिंदू शब्द का इतिहास देखने पर यह बात समझ में आती है। इस भाव में पूरे विश्व को जोड़ने की शक्ति है। इसमें किसी को बदले बिना, किसी की विशेषता या छोटी पहचान को नष्ट किए बिना, सभी पहचानों को एक सूत्र में पिरोकर पूरे समाज को साथ लेकर चलने की क्षमता है। भारत में इस भाव का आचरण तीन रूपों में दिखाई देता है-पहली बात है भारत माता की सेवा और भारत को सबसे ऊपर रखना।
दूसरी बात है कि हम सब समान हैं। हमारा प्रांत या पंथ कुछ भी हो, हमारा मूल एक है। हमारे महापुरुषों ने इस संस्कृति को जिया, इसकी रक्षा के लिए खून-पसीना बहाया। उनके आदर्शों का गौरव बनाए रखना और उनका अनुकरण करना आवश्यक है। तीसरी बात यह है कि यह हमारा परंपरा से आया हुआ स्वभाव है। व्यक्ति के स्वभाव को जब समाज के स्तर पर देखा जाता है, तो उसे संस्कृति कहते हैं। ऐसा जीवन जीना आवश्यक है, जिसे देखकर दुनिया को राहत मिले। प्राचीन काल से भारतभूमि पर रहने वाले हमारे सभी पूर्वज विभिन्न परिस्थितियों में इसी प्रकार जीते आए हैं। जीने का यही आदर्श हमें दुनिया के सामने रखना है।
हम सभी भारतवासियों की एकता – स्वाभाविक व बिना शर्त
हम सब का परस्पर नाता व भारत के साथ सम्बन्ध यह एक जीवमान सम्बन्ध है जो हृदय का होने से बिना शर्त है। ‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें’। अपनेपन के, आत्मीयता के अथवा रिश्ते-नातों के संबंधों में कोई शर्तें नहीं होती। ऐसा नहीं है कि भारत से हमें कुछ नहीं मिला, तो हम भारत के नहीं हैं। हमारा संबंध एकतरफा है। भारत हमें कुछ दे या न दे, भारत के लिए हमारा सब कुछ है। मुख्य अतिथि ने अपने उद्बोधन में बताया कि प्रश्न यह है कि हम भारत को क्या देंगे। यदि हमारा जीवन मातृभूमि के बलिदान और समर्पण में लग जाए, तो यह हमारा सौभाग्य है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हम तीन बंधु तुम्हारे लिए समर्पित हो गए। इसमें कोई विशेष बात नहीं है; यदि हम साथ होते, तो भी तुम्हारे इस पवित्र कार्य पर बलिदान हो जाते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी हिन्दू भाव को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सुसंगठित व बल संपन्न समाज बनाने के लिए कार्य कर रहा है। संपन्नता और सामर्थ्य इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए। जब शक्ति समाप्त हो जाती है, तो जीवन की सामान्य क्रियाएँ भी कठिन हो जाती हैं।
संगठित व बल संपन्न हिन्दू समाज की बात करना या उसके लिए कार्य करना सर्व पंथ समादर की भावना अथवा राष्ट्र की भावनिक एकात्मकता के विरुद्ध नहीं है; हिन्दू समाज का विचार व स्वभाव समावेशक होने के नाते संघ कार्य हम सब की भावनिक एकात्मता, सद्भावना व सदाचार का पोषक ही होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा यह स्वभाव व संस्कार ही कैप्टन स्मित मच्छार को अपनी प्राणों की बाजी लगाकर मनुष्यों के संरक्षण के लिए स्वयं को झोंक देने की प्रेरणा देता है।
सद्भावनापूर्ण व्यवहार आवश्यकसरसंघचालक जी ने कहा कि हमें विविधता के बीच रहना है। अलग-अलग भाषा, पंथ और रीति-रिवाजों को मानने वाले लोगों के साथ मिल-जुलकर रहना है। लेकिन हमारा ध्यान भीतर की एकता पर होना चाहिए। हमारा इतिहास बहुत कड़वा रहा है और उसमें अनेक संघर्ष हुए हैं। उनके कारण मन में घाव और गाँठें बनी हैं। एक-दूसरे को देखकर आशंकाएँ भी पैदा होती हैं कि अब यह क्या करेगा और इसका व्यवहार ठीक होगा या नहीं। इन गाँठों को सुलझाना है, आपसी संदेह दूर करना है और नई गाँठें तथा नई शंकाएँ पैदा नहीं होने देनी हैं।छोटी-छोटी बातों पर उकसाकर झगड़ा कराने वाली ताकतों से हमें दूर रहना चाहिए।
हमारे समाज की विविधता और इतिहास को देखते हुए अभी ऐसा वातावरण कम मिलता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यह वातावरण कहीं नहीं है। कुछ घटनाएँ होती हैं, जिनसे असंतोष और आपसी शंकाएँ पैदा होने की संभावना रहती है। शासन-प्रशासन, समाज का नेतृत्व करने वाले लोगों और समूहों को भी अपने व्यवहार में भद्रता रखनी चाहिए। विशेषकर जब कोई विशेष अभियान चलता है या कोई नीति समाज पर लागू की जाती है, तब नागरिकों के सम्मान का ध्यान रखना चाहिए और ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए जिससे उनका अपमान हो।
संघ के कार्य का आधार शुद्ध सात्त्विक प्रेम है। संघ का कार्य स्वयंसेवकों के समर्पण एवं सेवा – परिश्रम के कारण चलता है। संघ को अपने स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए। एक सत्य को लेकर उसकी प्रतिस्थापना के लिये श्रद्धा विश्वास पूर्वक स्वयंसेवक लक्ष्य पूर्ण होने तक कार्य करते रहेंगे। यह प्रेम किसी एक व्यक्ति या समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि हर हिंदू के लिए है। हिंदू का अर्थ है सबके प्रति प्रेम रखने वाला और पूरे विश्व को अपना कुटुंब मानने वाला। संघ न लोकप्रियता चाहता है और न प्रतिस्पर्धा। हम अपना काम करते रहेंगे। समाज के कल्याण के लिए निरंतर काम करते रहेंगे।
विश्व में आसुरी शक्तियाँ और भारतसरसंघचालक जी ने दुनिया में फैल रही बुराइय़ों को लेकर कहा कि भारत सहित सारे विश्व में जो-जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट उद्ध्वस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। विश्व भर के तथाकथित प्रगत देश भी उस से त्रस्त, असहाय हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो-चार दिनों से जो समाचार आ रहे हैं, उन्हें देख लीजिए। खासकर फ्रांस में क्या हो रहा है और बांग्लादेश, नेपाल में क्या हुआ, इन सबके पीछे किस प्रकार की गतिविधियाँ चल रही हैं, इस पर ध्यान देना चाहिए।
वे कहते हैं कि शासन या नेतृत्व बदलने से परिस्थिति बदल जाएगी, लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और आज भी नहीं हो रहा है। अपने स्वार्थों का पोषण करने वाले और अपने समर्थकों को हर जगह प्रभावित किया जाता है। इस प्रकार की गतिविधियाँ दुनिया भर में चल रही हैं। भारत का आगे बढ़ना ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाएगा, इसलिए भारत उनका प्रमुख लक्ष्य है। भारत में भी ऐसे प्रयास चल रहे हैं।
भारत, हिन्दू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं इस का विचार कर योजना बना कर आसुरी ताकतें कार्य करती हैं। उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें सहायता के लिये मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्ता स्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं।
आंदोलन समाधान के लिए हों
देश में चल रहे आंदोलनों को लेकर सरसंघचालक जी कहते हैं कि अपने इतने बड़े समाज में समस्याएँ तो हैं। व्यवस्था की कमियाँ भी ढेर सारी होंगी। उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है। परन्तु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए। आन्दोलन करने वाला समाज का कोई समूह हो, शांति व सुव्यवस्था कायम रखने के लिए कार्यवाही करने वाला शासन-प्रशासन या राजनीतिक नेतागण हो, हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, त्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए, भावनाएं तीव्र होने पर भी कानून की मर्यादा में, भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियाँ हों, यह ध्यान रखना चाहिए।
उन्होंने ये भी कहा कि हमें ध्यान रखना चाहिए कि सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक और सद्बुद्धि पर हावी न हो। इसके लिए हम सभी को प्रयास करना होगा।
समाज के उद्यम से समाधानसमाज की सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है अथवा आन्दोलनों से ही समस्याएं सुलझती हैं, ऐसा भी अनुभव नहीं है। समाज की सक्रियता व आपसी संवाद के आधार पर भी समस्याओं का समाधान निकल सकता है। स्वयंसेवक समाज में सामाजिक उद्यम खड़ा करने का प्रयास करते है। ग्रामीण विद्यालयों को ध्यान में रखते हुए स्वयंसेवकों के प्रयासों का अनुभव उत्साहवर्धक है। 21 प्रान्तों के 210 जिलों में लगभग 1296 विद्यालयों में देखा गया कि जहाँ ग्रामवासियों का सहभाग व स्वयंसेवकों का साथ रहा, वहां छात्रों की उपस्थिति, सीखने का स्तर तथा अभिभावकों की सहभागिता में सुधार आया।
समाज ने शिक्षा सहायता तथा आधारभूत सुविधाओं के साथ साथ खेल व सांस्कृतिक तथा मूल्य आधारित गतिविधियों में भी योगदान दिया। ग्रामवासियों के सम्मिलित प्रयासों के आधार पर गावों के समग्र विकास के प्रयास तो हजारों ग्रामों में चल रहे हैं।
सजगता की आवश्यकतासमाज व देश को चलाने की जिम्मेदारी हमारी भी है, क्योंकि यह देश व समाज मेरा अपना है, यह अपनेपन की प्रेरणा रहती है। आंदोलनों के पीछे भी यही प्रेरणा होनी चाहिए। परन्तु जब ऐसी स्थिति न होकर आंदोलन राजनीति का साधन बन जाता है, किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोधी शत्रुभाव लेकर चलता है तब इसका लाभ भारत को दबाना चाहने वाली शक्तियां लेती हैं।
मतभेदों को और गहरा बनाकर मनभेद उत्पन्न करना, समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में अन्यायग्रस्तता की भावना उत्पन्न करना आदि करते हुए देश की व्यवस्थाओं के बारे में अश्रद्धा उत्पन्न करना, कलह, उग्र असंतोष, अलगाव, अव्यवस्था व अराजकता का वातावरण बनाना, यह उनकी कार्यपद्धति है। भारत को दबाये रखना चाहने वाली विश्व की शक्तियां भी कभी-कभी इसमें अपना खेल करती रहती हैं।
विश्व की परिस्थिति विचित्र है। वे भारत को चाहते भी हैं, लेकिन भारत को बड़ा होते हुए नहीं देखना चाहते, क्योंकि इससे उनके अपने बड़प्पन को धक्का लगेगा। इसलिए वे अपना खेल जारी रखते हैं। श्रीमती आशा भोंसले जी का एक बहुत पुराना गीत है, जिसे पुराने लोगों ने सुना होगा। पी. सालाम द्वारा लिखे गए इस गीत में कहा गया है,
वागिनीचा भेदभावा, दुष्ट तेजा फिरो तो कावा।
गाठुनिया बुढ़ा जीवा, अंधारात गाजेले धावा।।