
संघ अब इस जनसंपर्क को स्थायी सामाजिक गतिविधियों में बदलने की तैयारी में है। पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए आरक्षण जारी रखने का समर्थन, युवाओं में बढ़ते नशे की प्रवृत्ति पर चिंता और सामाजिक संगठनों को साथ लेकर इसके विरुद्ध अभियान चलाने की पहल इसी बदलती कार्यदिशा के प्रमुख संकेत हैं। इंदौर के डेली कॉलेज परिसर में दो से चार नवंबर तक चली संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय बैठक बुधवार को संपन्न हुई। बैठक में देशभर से करीब 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। समापन के बाद सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने पत्रकारों से बातचीत में शताब्दी वर्ष की उपलब्धियों, संगठनात्मक विस्तार, सामाजिक समरसता, आरक्षण, युवाओं की चुनौतियों, आपदा राहत और संघ की भावी योजनाओं का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत किया।
देश के 63 हजार स्थानों पर 99 हजार से अधिक दैनिक शाखाएंसंघ के संगठनात्मक विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दैनिक शाखाओं की बढ़ती संख्या है। होसबाले के अनुसार अक्टूबर 2025 से अक्टूबर 2026 के बीच संघ ने देशभर में 10,241 नए स्थानों तक अपनी पहुंच बनाई। वर्तमान में 63,208 स्थानों पर 99,423 दैनिक शाखाएं संचालित हो रही हैं। पिछले वर्ष की तुलना में दैनिक शाखाओं में 12,025 की वृद्धि हुई है, जबकि शाखा संचालित होने वाले स्थानों की संख्या 8,156 बढ़ी है।
दैनिक शाखाओं के अतिरिक्त 34,982 साप्ताहिक मिलन और 14,096 मासिक मंडलियां संचालित हो रही हैं। इस प्रकार दैनिक शाखाओं, साप्ताहिक मिलन और मासिक मंडलियों को मिलाकर संघ की गतिविधियां देशभर में 1,03,397 स्थानों तक पहुंच गई हैं। साप्ताहिक मिलन में पिछले वर्ष की तुलना में 2,600 से अधिक और मासिक मंडलियों में 463 की वृद्धि दर्ज की गई है। संघ ने संगठन विस्तार के लिए दो स्तरों पर काम किया। नियमित शाखाओं की संख्या बढ़ाने के साथ नए गांवों और बस्तियों में एक सप्ताह से दस दिनों तक शाखाएं लगाकर लोगों को संघ की कार्यपद्धति से परिचित कराया गया। इस अभियान के माध्यम से उन क्षेत्रों तक पहुंच बनाने का प्रयास हुआ, जहां पहले संघ की गतिविधियां सीमित थीं।
शताब्दी वर्ष में संघ की सबसे बड़ी सामाजिक संपर्क गतिविधियों में हिंदू सम्मेलन प्रमुख रहे। देशभर में 65,664 ग्रामीण और नगरीय स्थानों पर आयोजित इन सम्मेलनों में करीब 4.94 करोड़ लोगों ने सहभागिता की। इनमें लगभग 2.69 करोड़ पुरुष और 2.25 करोड़ महिलाएं शामिल रहीं। सरकार्यवाह के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 37,080 और नगरीय बस्तियों में 28,514 सम्मेलन आयोजित किए गए। इनका उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत करना था। सम्मेलनों में पंच परिवर्तन के पांच प्रमुख विषयों के साथ सामाजिक कुरीतियों, नशे से दूरी, गांवों में एकजुटता और सकारात्मक जीवनशैली पर चर्चा की गई। संघ ने इन कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठकर सामूहिक हित में काम करने का संदेश दिया। इन सम्मेलनों में करीब 95 प्रतिशत आयोजनों में कम से कम एक महिला वक्ता की सहभागिता भी रही।
10 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंचा गृह संपर्क अभियानशताब्दी वर्ष में संघ ने घर-घर तक पहुंच बनाने के लिए व्यापक गृह संपर्क अभियान चलाया। इसके अंतर्गत देशभर में 10,22,05,665 घरों तक स्वयंसेवकों ने संपर्क किया। अभियान के दौरान 4,63,340 गांवों और 41,825 नगरीय बस्तियों तक पहुंच बनाई गई। देश के कुल 59,008 मंडलों में से 54,937 मंडलों में यह अभियान संचालित हुआ। स्वयंसेवकों ने परिवारों के बीच पांच से 25 मिनट तक समय बिताकर संघ की गतिविधियों, उद्देश्यों और पंच परिवर्तन की अवधारणा की जानकारी दी। श्री होसबाले के अनुसार, संघ की आगामी रणनीति इस संपर्क को निरंतर बनाए रखने की है। इसके लिए समाज के प्रबुद्ध लोगों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय व्यक्तियों के साथ नियमित संवाद जारी रखने पर जोर दिया गया है।
आरक्षण पर संघ का स्पष्ट रुख, भेदभाव समाप्त होने तक जारी रहे व्यवस्थासामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दे पर होसबाले ने संघ का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े उन वर्गों के लिए आरक्षण जारी रहना चाहिए, जिन्हें ऐतिहासिक भेदभाव के कारण असमानता का सामना करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव से पैदा हुई असमानताएं समाप्त नहीं होतीं और प्रभावित वर्गों को समानता का वास्तविक अनुभव नहीं होता, तब तक आरक्षण की व्यवस्था बनी रहनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण का लाभ उन सभी पात्र लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो इसके वास्तविक हकदार हैं।यदि किसी वर्ग को लाभ मिल रहा है और पात्र लोग इससे वंचित रह जा रहे हैं तो आवश्यक सुधारों पर विचार किया जा सकता है।
नशे के विरुद्ध सामाजिक संगठनों को साथ लाएगा संघयुवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर बैठक में विशेष चिंता व्यक्त की गई। होसबाले ने कहा कि नशे की समस्या समाज के सामने गंभीर चुनौती है। इसके समाधान के लिए सरकार के प्रयासों के साथ सामाजिक संगठनों, संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों को भी एकजुट होकर काम करना होगा।
उन्होंने नशे के कारोबार के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और सीमापार सक्रिय तस्करी तंत्र को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी प्रशासन की बताई। साथ ही कहा कि जो युवा पहले से नशे की गिरफ्त में आ चुके हैं, उनके पुनर्वास, मानसिक परामर्श और पारिवारिक समस्याओं के समाधान पर भी ध्यान देना आवश्यक है। संघ इस दिशा में नशामुक्ति के लिए काम कर रहे संगठनों को एक मंच पर लाने का प्रयास करेगा। युवाओं को सकारात्मक, रचनात्मक और सेवा गतिविधियों से जोड़ने की योजना भी इसी का हिस्सा है। शताब्दी वर्ष में 35 वर्ष से कम आयु के युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए। महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के लिए 21,237 स्थानों पर 57,243 कार्यक्रम हुए, जिनमें 31.26 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। युवा व्यवसायियों के लिए 14,285 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें करीब 6.90 लाख युवाओं की सहभागिता रही। दोनों श्रेणियों में कुल सहभागिता 38 लाख से अधिक रही।
आपदा राहत में पांच करोड़ रुपये से अधिक की सहायताबैठक में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का भी विस्तृत विवरण दिया गया। असम के शिवसागर और जोरहाट जिलों में आई बाढ़ तथा नागालैंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी वर्षा से 805 गांवों के 67,700 परिवार प्रभावित हुए। 1,500 से अधिक मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। राहत कार्यों में 1,600 से अधिक स्वयंसेवकों ने भाग लिया और करीब 42,200 परिवारों तक भोजन, पानी और दवाइयां पहुंचाईं। लगभग 150 परिवारों के मकानों के पुनर्निर्माण के लिए निर्माण सामग्री की व्यवस्था की गई। इस अभियान के लिए समाज के सहयोग से पांच करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटाई गई।
चित्रकूट में मंदाकिनी नदी की बाढ़ से 28 गांवों के करीब दो हजार परिवार प्रभावित हुए। यहां 350 स्वयंसेवकों ने राहत कार्यों में हिस्सा लिया। छह हजार से अधिक लोगों के भोजन और 5,600 लोगों के उपचार की व्यवस्था की गई। लखनऊ में भारी बारिश से 40 हजार से अधिक परिवार प्रभावित हुए, जिनमें करीब 25 हजार परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। यहां 300 से अधिक स्वयंसेवकों ने प्रशासन के साथ मिलकर राहत अभियान चलाया। ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में चक्रवात से प्रभावित परिवारों को भी सहायता पहुंचाई गई। बिजली के खंभे गिरने, फसलों और मकानों को नुकसान पहुंचने तथा मछुआरा समुदाय के सामने आई कठिनाइयों के बीच स्वयंसेवकों ने भोजन, पानी, रोशनी और मछली पकड़ने के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने में सहयोग किया।
46 प्रांतों की जगह 88 संभागों में बनेगा नया संगठनात्मक ढांचासंघ अपनी संगठनात्मक संरचना में भी महत्वपूर्ण बदलाव करने जा रहा है। अभी तक संघ का कार्य 46 प्रांतों के माध्यम से संचालित होता रहा है। नवंबर और दिसंबर में होने वाली संगठनात्मक प्रक्रिया के बाद इसे 88 संभागों में पुनर्गठित किया जाएगा। होसबाले के अनुसार संभाग स्तर पर भी संघचालक और अन्य पदाधिकारियों की व्यवस्था बनाई जाएगी। प्रांत स्तर पर प्रांत संघचालक, प्रांत कार्यवाह और प्रांत प्रचारक की तरह संभाग स्तर पर भी जिम्मेदारियां निर्धारित होंगी। इससे संगठनात्मक गतिविधियों के संचालन, समन्वय और विस्तार को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास होगा। पश्चिम बंगाल में संघ की शाखाओं की संख्या पहले की तुलना में करीब 150 गुना बढ़ने की जानकारी भी दी गई। होसबाले ने कहा कि पहले वहां शाखाएं शुरू करने पर विरोध का सामना करना पड़ता था, जबकि अब परिस्थितियों में बदलाव आया है। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में भी संगठन की पहुंच बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
संघ के पंजीयन को लेकर पूछे गए प्रश्न पर होसबाले ने कहा कि देश में किसी संगठन को सामाजिक कार्य करने के लिए पंजीकृत कराना अनिवार्य करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। अनेक संगठन और समूह बिना पंजीयन के भी समाज के लिए काम करते हैं। उन्होंने कहा कि संघ स्वयं को समाज से अलग संस्था के रूप में नहीं देखता, उसका उद्देश्य समाज को संगठित करना है। संघ अपनी सभी गतिविधियां संविधान और देश के कानूनों के अनुरूप संचालित कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि संघ का अंतरराष्ट्रीय संगठन बनने का कोई इरादा नहीं है। दुनिया के करीब 80 देशों में स्वयंसेवक स्थानीय हिंदू समुदायों के साथ वहां के कानूनों के अनुरूप सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियों में सहयोग करते हैं।
डिजिटल पीढ़ी के लिए परिवार और संस्कार पर जोरडिजिटल प्लेटफार्मों के युवाओं और बच्चों पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर होसबाले ने कहा कि तकनीक पर कानूनी नियंत्रण के साथ संस्कार और पारिवारिक वातावरण की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संघ शाखाओं, परिवारों, विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से मूल्य आधारित शिक्षा को मजबूत करने पर जोर देता है। उन्होंने परिवारों से मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाकर प्रतिदिन कुछ समय एक-दूसरे के साथ बिताने का आग्रह किया। बच्चों को इतिहास, संस्कृति, समाज सेवा और परिवार के अच्छे कार्यों से परिचित कराने की जरूरत बताई। युवाओं के आंदोलनों और राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी पर उन्होंने कहा कि उनकी वास्तविक समस्याओं और अपेक्षाओं को सुनना समाज तथा सरकार की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में अपनी बात रखने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार सभी को है, परंतु हिंसा, सामाजिक विभाजन और अराजकता के माध्यम से राजनीतिक उद्देश्य हासिल करने की प्रवृत्ति उचित नहीं है।
बैठक में शताब्दी वर्ष के दौरान शुरू हुई गतिविधियों को आगे बढ़ाने, पंच परिवर्तन को सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाने और समाज की सज्जन शक्ति के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखने पर भी विचार हुआ। राजनारायण बोस की 200वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100वें वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के जन्म के 100वें वर्ष के संदर्भ में उनके योगदान का स्मरण किया गया। उल्लेखनीय है कि इस तीन दिवसीय मंथन का व्यापक संदेश यही रहा कि शताब्दी वर्ष में बने संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक संपर्क को अब नियमित गतिविधियों में बदलना संघ की अगली प्राथमिकता होगी। शाखाओं की बढ़ती संख्या के साथ सामाजिक समरसता, युवाओं का सकारात्मक जुड़ाव, नशामुक्ति और सेवा कार्यों को व्यापक सामाजिक अभियान का स्वरूप देने की दिशा में संघ आगे बढ़ने की तैयारी में है।