
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित ऐतिहासिक जगह मल्हार में करीब 1500 साल पुराना एक ताम्रपत्र मिला है। यह ताम्रपत्र वजन में साढ़े तीन किलो (3.5 किलोग्राम) है। इसे लगभग सौ साल पहले एक किसान को अपने खेत में मिला था। बाद में किसान ने इसे अपने दादा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छेदीलाल पांडेय को सौंप दिया। तब से यह परिवार के पास सुरक्षित रखा हुआ था।
पहले भी मिले थे प्राचीन अवशेषमल्हार एक पुरानी बस्ती है, जहां कई प्राचीन अवशेष पहले भी मिल चुके हैं। इस ताम्रपत्र की खोज अब ज्ञान भारतम अभियान की एक विशेषज्ञ टीम को हुई। यह अभियान संस्कृति मंत्रालय के तहत चल रहा है। टीम के लोग मल्हार के रहने वाले संजीव पांडेय के घर गए और ताम्रपत्र के बारे में विस्तार से जानकारी ली।यह ताम्रपत्र छठी-सातवीं शताब्दी का माना जा रहा है। उस समय दक्षिण कोसल क्षेत्र में पांडु वंश का राज था। राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन (595-655 ईस्वी) उस वंश के शक्तिशाली शासक थे और उनकी राजधानी सिरपुर थी। ताम्रपत्र ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखा गया है।
गांव को दान देने का जिक्रइसमें मुख्य रूप से एक गांव दान देने का जिक्र है। राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन ने हैहयवंशी कलचुरी वंश के राजा जाज्वल्यदेव को यह गांव दान में दिया था। हैहयवंशी कलचुरी वंश का शासन काल लगभग 550 ईस्वी से शुरू माना जाता है।
1975 में उज्जैन के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर ने इस ताम्रपत्र की जांच की थी और ब्राह्मी लिपि व पाली भाषा की पुष्टि की थी। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे ताम्रपत्र उस दौर की राजवंशों के बीच संबंधों, भूमिदान प्रथा और सामाजिक व्यवस्था को समझने में काफी मदद करते हैं।
अभी जिला प्रशासन इसकी दस्तावेजीकरण की तैयारी कर रहा है। टीम इसे वैज्ञानिक जांच और संरक्षण के लिए दिल्ली भेजने की योजना बना रही है। संजीव पांडेय के परिवार ने पुरातात्विक महत्व को समझते हुए इसे इतने सालों तक संभाल कर रखा था। यह खोज स्थानीय इतिहास को और बेहतर तरीके से जोड़ने वाली है। मल्हार जैसे इलाके में ऐसी चीजें मिलना पुराने समय के राजकीय और धार्मिक गतिविधियों की झलक देता है।
(Courtesy: Panchjanya)