
संवाद की दुनिया में अभी नवजात कहे जा सकने वाले सोशल मीडिया की बात करें तो किसी भी कार्य को जब शुरू किया जाता है तो धीरे-धीरे काल प्रवाह में उसके कुछ उच्च आदर्श स्थापित हो जाते हैं। कालांतर में उस कार्य में लगे लोग उन आदर्शों का उदाहरण देने लगते हैं और प्रयास किया जाता है कि उन आदर्शों तक पहुँचा जाए। उस व्यवसाय में लगा व्यक्ति यदि उन आदर्शों का पालन करने का प्रयास करता है तो उसकी प्रसंशा होती है। सभी का प्रयास रहता है कि इन आदर्शों का पालन किया जाए। कितना पालन हो पाता है कितना नहीं, यह अलग विषय है। लेकिन आदर्श सदैव सामने रहने चाहिए ताकि वे मार्गदर्शन करते रहें। आदर्श राजनीतिज्ञ कैसा होना चाहिए, इसके लिए कई बार सरदार पटेल या लाल बहादुर शास्त्री द्वारा स्थापित आदर्शों का उदाहरण दिया जाता है। कुटनीतिज्ञ कैसा होना चाहिए? तब कुटनीतिज्ञ चाणक्य का नाम लेते हैं। आदर्श राजा या आदर्श राज्य कैसा होना चाहिए ? इसके लिए रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। सत्य बोलने की बात करनी हो तो महाराजा हरिश्चंद्र के उच्च आदर्श का नाम लिया जाता है। ठीक उसी प्रकार जब पत्रकारिता के उच्च आदर्श की बात की जाती है तो सहज ही महर्षि नारद का नाम स्मरण हो आता है।
पत्रकारिता में महर्षि नारद का आदर्शवस्तुत: पत्रकारिता में आदर्शों की खोज या आदर्श पत्रकार की पहचान ही हमें महर्षि नारद तक ले जाती है। खबर लेने, देने या संवाद रचना में जो आदर्श और परंपरा उन्होंने स्थापित की थी, वह आज की पत्रकारिता के लिए एक मानक है। लोक संचार में उन्होंने जो मूल्य स्थापित किए वे आज के पत्रकारों के लिए आदर्श माने जाते हैं।
नारद जी एक पौराणिक महापुरुष‘नारद’ शब्द में ‘नार’ का अर्थ है ‘जल’ तथा ‘अज्ञान’ और ‘द’ का अर्थ है ‘देना’ या ‘नाश करना’। अर्थात जो पितरो को तर्पण द्वारा सदा जल प्रदान करता है, इसलिए नारद नाम पड़ा। दूसरा अर्थ है – अज्ञान का जो नाश कर ज्ञान का प्रकाश दे, उसे नारद कहते है। भारतीय ज्ञान परंपरा में अलग-अलग जगह पर महर्षि नारद का उल्लेख है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह ब्रह्मा जी के पुत्र है, भगवान विष्णु जी के भक्त और बृहस्पति जी के शिष्य है। इन्हें एक लोक कल्याणकारी संदेशवाहक और लोक-संचारक के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि प्राचीनकाल में सूचना, संवाद, संचार व्यवस्था मुख्यत: मौखिक ही होती थी और मेले, तीर्थयात्रा, यज्ञादि कार्यक्रमों के निमित्त लोग जब इक_े होते थे, तो सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे।
देवर्षि नारद जी के लिए ‘आचार्य पिशुन:’ का उल्लेख कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में कई बार आया है। इसके अतिरिक्त संस्कृत के शब्दकोशों में भी ‘आचार्य पिशुन:’ का अर्थ देवर्षि नारद, सूचना देने वाला, संचारक, सूचना पहुंचाने वाला, सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक देने वाला है। आचार्य का अर्थ, गुरु, शिक्षक, यज्ञ का मुख्य संचालक, विद्वान आदि है। इन दोनों शब्दों का अर्थ हुआ, सूचना देने वाला विद्वान अथवा विज्ञ पुरुष। इस अर्थ का संयुक्त उपयोग संस्कृत साहित्य में जिसके लिए किया गया, वह है देवर्षि नारद जी। इस प्रकार संस्कृत साहित्य में देवर्षि नारद के लिए उल्लिखित ‘आचार्य पिशुन:’ से स्पष्ट है कि देवर्षि नारद तीनों लोकों में सूचना अथवा समाचार के प्रेषक के रूप में विख्यात थे।
दक्ष के श्राप और नारद जी का लोकहितइसी क्रम में एक और भी संदर्भ महत्त्वपूर्ण है, जो देवर्षि नारद जी के पत्रकारिता व्यवहार को स्पष्ट करता है। पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी के आदेश पर उनके पुत्र ‘दक्ष’ के सौ पुत्र हुए और सभी पुत्रों को सृष्टि बढ़ाने का आदेश मिला। लेकिन ब्रह्माजी के मानसपुत्र और ‘दक्ष’ के भाई ‘नारद’ ने सभी दक्ष पुत्रों को सृष्टि से अलग कर तप में लगा दिया। ‘दक्ष’ ने पुन: अपने पुत्रों को सृष्टि का आदेश दिया। किंतु, इन दक्ष पुत्रों को भी नारद जी ने सृष्टि के स्थान पर तपस्या में लगाया। इससे क्रोधित होकर ‘दक्ष’ ने नारद जी को श्राप दिया कि- (1) सदा विचरण करेंगे, (2) कहीं अधिक समय तक नहीं रुकेंगे एवं (3) एक स्थान की सूचना दूसरे स्थान पर पहुंचाएंगे। देवर्षि नारद ने ‘दक्ष’ के इन तीनों श्रापों को लोकहित में स्वीकार किया।
नारद जी: ग्रंथों के रचयिता और संचारकआदि पत्रकार देवर्षि नारद सूचना के संप्रेषक अथवा प्रसारक होने के साथ-साथ-नारद पुराण, नारदस्मृति, नारदीय ज्योतिष आदि ग्रन्थों के रचयिता थे। ‘वीणा’ नामक वाद्य यंत्र का उन्होंने आविष्कार किया। संगीत शास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता थे। नारद जी के अनुसार संदेश वक्ता, श्रोता एवं कथन है। यही सूत्र पत्रकारिता का सार है।
आदि पत्रकार नारद की भूमिकाआदि पत्रकार नारद जी की पत्रकारिता सज्जन रक्षक और दुष्ट विनाश की थी। समुद्र मंथन में विष निकलने की सूचना सर्वप्रथम आदि पत्रकार नारद ने मंथन में लगे पक्षों को दिया परंतु सूचना पर ध्यान नहीं देने से विष फैला। आदि पत्रकार नारद ने सती द्वारा ‘दक्ष’ के यज्ञ कुंड में शरीर त्यागने की सूचना सर्वप्रथम भगवान शिव को दी। महाभारत के युद्ध के समय तीर्थयात्रा पर गए बलराम जी को महाभारत के युद्ध की समाप्ति की सूचना नारद जी ने ही दी। नारद जी एक पत्रकार के रूप में जगन्नाथ की रथयात्रा को प्रारंभ कराया। इतना ही नहीं पत्रकार के रूप में काशी, प्रयाग, मथुरा, गया, बद्रिकाश्रम, केदारनाथ, रामेश्वरम् सहित सभी तीर्थों की सीमा तथा महत्व का वर्णन नारद पुराण में है। नारद जी ने प्रश्नोत्तरी पत्रकारिता का भी शुभारंभ किया। उन्होंने प्रश्न का सही उत्तर देने पर पुरस्कार की परम्परा प्रारम्भ की, यह उल्लेख पुराणों में है।
नारदपुराण – नारद जी के इस ग्रंथ में नदियों की महिमा तथा पवित्र तीर्थों का महात्म्य; भक्ति, ज्ञान, योग, ध्यान, वर्णाश्रम-व्यवस्था, सदाचार, व्रत, श्राद्ध आदि का वर्णन तो हुआ ही है किन्तु छह वेदांगों का वर्णन, विशेष रूप से त्रिस्कन्ध ज्योतिष का विस्तृत वर्णन, मन्त्र-तंत्र विद्या, प्रायश्चित-विधान और सभी अठारह पुराणों का प्रामाणिक परिचय ‘नारदपुराण’ की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं।
नारद स्मृति – व्यावहारिक विषयों का नारद स्मृति में निरूपण किया गया है। न्याय, वेतन, सम्पति का विक्रय, क्रय, उत्तराधिकार, अपराध, ऋण आदि विषयों पर कानून है। इस स्मृति में नारद संगीत ग्रन्थ होने का भी उल्लेख है।
नारद भक्ति-सूत्र – महर्षि नारद द्वारा रचित 84 भक्ति सूत्रों का यदि सूक्ष्म अध्ययन करें तो केवल पत्रकारिता ही नहीं पूरे मीडिया के लिए शाश्वत सिद्धांतो का प्रतिपालन दृष्टिगत होता है। उनके द्वारा रचित भक्ति सूत्र आज के समय में कितना प्रासंगिक है – सूत्र 72 एकात्मकता को पोषित करने वाला अत्यंत सुंदर वाक्य है, जिसमें नारद जी समाज में भेद उन्पन्न करने वाले कारकों को बताकर उनको निषेध करते हैं।
नास्ति तेषु जातिविधारूपकुलधनक्रियादिभेद:।। – अर्थात् :- जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, कार्य आदि के कारण भेद नहीं होना चाहिए।
‘श्रीशिवमहापुराण’ में नारद-ब्रह्मा सम्वाद मिलता है जोकि प्राचीन साहित्य में नारद जी की प्रासंगिकता को ही दर्शाता है। ‘श्रीशिवमहापुराण’ के साथ-साथ ‘वामनपुराण’ के भी अलग-अलग प्रकरण में नारद-सम्वाद मिलते हैं। इसके अतिरिक्त जैन धर्म के प्राचीन इतिहास में भी नारद-सम्वाद का उल्लेख किया गया है।
‘वाल्मीकीय रामायण’ 1।6 में नारद को ‘त्रिलोकज्ञ’ कहा है। प्रतीत होता है कि तीनों लोको में भ्रमण करने के कारण वह उनका पूर्ण ज्ञान रखते थे। पुराणों में उन्हें देवर्षि कहा गया है। सनत्कुमार, महर्षि नारद के गुरु माने जाते हैं। छान्दोग्योपनिषद्, अध्याय सात के अनुसार नारद जी ने सनत्कुमार से अध्यात्म ज्ञान प्राप्त किया तथा सनत्कुमार से ही उन्होंने रोग-विषयक अनेक कल्प सुने।
आधुनिक कालखंड में नारद की प्रासंगिकताआधुनिक भारत का प्रथम हिंदी साप्ताहिक ‘उदन्तमार्तण्ड’ 30 मई 1826 को कोलकाता से प्रकाशित हुआ था। इस दिन नारद जयंती थी तथा इस पत्रिका के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर सम्पादक ने कहा, ‘देवर्षि नारद की जयंती के शुभ अवसर पर यह पत्रिका प्रकाशित होने जा रही है क्योंकि नारद जी एक आदर्श संदेशवाहक होने के नाते उनका तीनों लोक (देव, मानव, दानव) में समान सहज संचार था।
वास्तव में, इतिहास के पन्नों को उलट कर देखें तो सूचना संचार (आधुनिक भाषा में – कम्युनिकेशन) के क्षेत्र में उनके प्रयास अभिनव तत्पर और परिणामकारक रहते थे। उनके प्रत्येक परामर्श तथा वक्तव्य में लोकहित प्राथमिक रहता था। इसलिए अतीत से लेकर वर्तमान सहित भविष्य में सभी लोकों के सर्वश्रेष्ठ लोक संचारक अगर कोई है तो वह देवर्षि नारद जी ही है।
महर्षि नारद: सद् समाचारदातामहर्षि नारद को सबसे बड़ा सद्समाचार दाता माना जाता है। प्राचीन काल से ही समाचार गुप्तचरों द्वारा प्राप्त किए जाते थे। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में समाचार दाताओं के नाम मिलते हैं। ‘रामायण’ में ‘सुमुख’ गुप्तचर वेष में समाचारों को जानकार राम जी को बताता है। महाभारत का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उस समय समाचारदाता लोग निर्धारित रहते थे, जो कि समाचार एक स्थान से लाया और ले जाया करते थे। ‘महाभारत’ में ‘संजय’ की भूमिका भी समाचारदाता के रूप में देखने को मिलती है। संजय ने धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र में होने वाले युद्ध का वर्णन प्रत्यक्ष की तरह किया है। प्राचीन साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि ‘भाट’ और ‘दूत’ लोग भी समाचार दाताओं का काम करते थे और उन्हें पूरी स्वतंत्रता दी जाती थी।
नारद जी के पत्रकारिता मानकआदि पत्रकार नारदजी ने वर्तमान के पत्रकारों के लिए जो मानक रखे हैं, उनका भी विश्लेषण आवश्यक है। उन्होंने माया के ज्ञान के लिए एक बार स्त्री का रूप धारण किया। यह उनकी अनुभवात्मक पत्रकारिता व्यवहार का श्रेष्ठ उदाहरण है। उन्होंने मृत्यु का भी जीवनवृत्त लिखा है, जो दुनिया में अन्यत्र नहीं है। कलियुग में भक्ति को दिए वरदान के परिणामस्वरूप भक्ति के प्रचार के लिए भक्तिसूत्र भी लिखा। कलियुग में धर्म की रक्षा एवं सदआचारण के लिए श्री सत्यनारायण कथा की प्रेरण दी। ‘महाभारत’ के पश्चात महर्षि वेदव्यास को शांति एवं संतोष के लिए भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र का गुणगान करने के लिए प्रेरित किया। इसी प्रेरणा के परिणामस्वरूप महर्षि वेदव्यास ने ‘श्रीमद्भागवत’ का लेखन किया। इसी के साथ-साथ नारदजी ने ‘इंद्रप्रस्थ’(दिल्ली) के नामकरण एवं ‘कुरूक्षेत्र’ के नामकरण तथा इतिहास का भी वर्णन किया है। आदि पत्रकार नारद जी ने सृष्टि के प्रारम्भ में ही पत्रकारिता के समक्ष जो आदर्श एवं स्वरूप प्रस्तुत किया वह अनुपम है। हमें आदि पत्रकार के रूप में महर्षि नारद के योगदान को सदैव याद रखना चाहिए। उन्होंने महान विपत्ति से मानवता की रक्षा का कार्य किया। एक समय जब अर्जुन दिव्यास्त्रों का परीक्षण करने जा रहे थे, उस समय अर्जुन को ऐसा करने से रोका। नारद जी ने अर्जुन से कहा था कि दिव्यास्त्र परीक्षण व प्रयोग की वस्तु नहीं है। इसका उपयोग आसुरी शक्तियों से सृष्टि की रक्षा करने के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार देवर्षि नारद ने शुचिता के साथ पत्रकारिता के कार्यों का निर्वहन किया। उनका पत्रकार कर्म श्रेष्ठ और सर्वोत्तम है।
न्यूज की परिभाषा और भारतीय दृष्टिकोणपत्रकारिता के विद्यार्थी को न्यू•ा शब्द की परिभाषा बताई जाती है कि नोर्थ, ईस्ट, वेस्ट और साऊथ अर्थात चारों दिशाओं से जो सूचना मिलती है वह न्यूज है। परंतु यह भारतीय परम्परा के अनुकूल नहीं है। चारों दिशाओं से आने वाली हर सूचना को समाचार नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रहित, समाज हित, धर्मरक्षा के लिए कुछ सूचनाएं गुप्त रखना भी जरूरी हैं। जैसे कि सैन्य अभियानों व आपातकाल के समय सैनिकों की गतिविधियों की सूचनाएं प्रसारित व प्रकाशित करने में राष्ट्रहित की अनदेखी नहीं की जा सकती। ऐसी सूचनाएं नहीं फैलाई जा सकती जो समाज में भ्रम, विद्वेष, नफरत, आत्महीनता का भाव पैदा करे। समाचार का भारतीय परम्परा में अर्थ है सम्यक विचार। परंपरागत मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया में भी काम करते समय हमें इन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।