
प्रयागराज। एक ही आटे की बनी रोटी जब अलग-अलग घरों, जातियों और सामाजिक पृष्ठभूमि के चूल्हों से निकलकर एक थाली में पहुंचती है, तो वह केवल भूख नहीं मिटाती, बल्कि मन और समाज के बीच की दूरियां भी कम करती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के काशी प्रांत द्वारा आयोजित ‘संघ शिक्षा वर्ग (सामान्य)’ में इन दिनों सामाजिक समरसता और सौहार्द का ऐसा ही अनूठा उदाहरण देखने को मिल रहा है।
यहां प्रशिक्षण ले रहे स्वयंसेवकों के लिए भोजन की रोटियां 30 ग्रामसभाओं के 125 गांवों (पुरवा) के अलग-अलग घरों से एकत्र की जा रही हैं। यह पहल इस भाव को पुष्ट कर रही है कि समाज का हर वर्ग एक है, सबका सुख-दुख साझा है और राष्ट्र निर्माण की शक्ति इसी एकात्मता में निहित है।
10 जिलों के 291 तरुण स्वयंसेवक ले रहे प्रशिक्षणयह संघ शिक्षा वर्ग प्रयागराज में यमुनापार स्थित गौहनिया के वात्सल्य परिसर में 7 जून तक चलेगा।
संघ शिक्षा वर्ग में शिक्षार्थी के तौर पर आए स्वयंसेवकों के भोजन और जलपान की संपूर्ण व्यवस्था गौहनिया के वात्सल्य परिसर में है, लेकिन शिक्षार्थियों के भोजन के लिए रोटी आसपास के 125 पुरवों-गावों से मांग कर लाई जा रही है। रोटी संग्रह का दायित्व सूचीबद्ध किए गए करीब 700 लोग निभा रहे हैं। प्रतिदिन सुबह और शाम करीब 125 घरों से कुल पांच हजार रोटियां एकत्र की जाती हैं।
झोला लेकर स्वयंसेवक घर-घर पहुंच रहे हैं और महिलाएं उन्हें वात्सल्य भाव से चूल्हे पर ताजी रोटियां सेंक कर दे रही हैं। कई जगहों पर परिवार की महिलाएं आग्रह करती हैं कि वे अपने द्वार पर आए व्यक्ति को सिर्फ रोटी कैसे दें, साथ में सब्जी व अन्य खाद्य सामग्री भी परोसती हैं।
जबकि कुछ स्थानों पर जब स्वयंसेवक कहते हैं कि उन्हें तीन लोगों के लिए सिर्फ 12 रोटियां चाहिए, तो भाव से परिपूर्ण महिलाएं कहती हैं-
“सनातनी परंपरा में निवाला नहीं गिनते। जो भी भोजन में है प्रेम से देंगे”जब छलक पड़े एक महिला के आंसू-
चूल्हे तक ‘राष्ट्रवाद’ की अलख जगाने का उद्देश्यरोटी संग्रह के दौरान एक भावुक क्षण भी आया। बारा तहसील के उमरी गांव की एक महिला इसलिए रो पड़ी क्योंकि उनके परिवार के लोग दुर्घटना में घायल किसी परिजन को लेकर अस्पताल गए थे। रोटी देने में असमर्थ होने से वह बेहद दुखी थी। इस पर स्वयंसेवकों ने उन्हें ढांढस बंधाया।
रोटियों को मांगने का मूल उद्देश्य चूल्हे तक राष्ट्रवाद की अलख जगाना और सामाजिक समरसता के भाव को अधिक पुष्ट करना है। जब स्वयंसेवक बारा तहसील के गंभीरपुर, सेहुड़ा, मैदा, चांदी, उमरी, फड़हा, सीधे, ओसा जैसे दर्जनों गांवों में जाते हैं, तो ग्रामीण उन्हें “हिंदू समाज से आए हैं” कहकर पुकारते हैं।
इस पहल से ग्रामीणों में भी संगठित होने और एक होने की ललक पैदा हो रही है। चूल्हों से निकली यह गर्माहट जाति-पांत के भेद मिटाकर एक सशक्त समाज और ‘विकसित राष्ट्र’ की अवधारणा को बल दे रही है।
बता दें कि संघ शिक्षा वर्ग में स्वयंसेवकों को श्रम साधना का पाठ पढ़ाया जा रहा है। यहां की दिनचर्या बेहद अनुशासित है-