27 अगस्त/इतिहास-स्मृति
भैरनपल्ली में भीषण हिन्दू नरसंहार
15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र तो हो गया; पर वह कई रियासतों में बंटा था। हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष सब रियासतें भारत में मिल गयीं। गृहमंत्री सरदार पटेल ने साम दाम दंड भेद की नीति अपनाकर हैदराबाद और जूनागढ़ को भारत में मिला लिया। जम्मू कश्मीर का विषय प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पास रखा। अतः वह समस्याग्रस्त ही रह गया।
हैदराबाद का शासक निजाम मीर उस्मान अली हिन्दुओं से घृणा करता था। वहां 13 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या थी; पर उच्च पदों पर 88 प्रतिशत मुसलमान थे। राज्य की आय का 97 प्रतिशत हिन्दुओं से आता था; पर शासन में उनका दखल न के बराबर था। निजाम चाहता था कि या तो वह स्वतंत्र रहे, या फिर मुस्लिम देश पाकिस्तान में मिल जाए। कासिम रिजवी के नेतृत्व में ‘मजलिस एतिहाद उल मुसलमीन’ नामक संस्था इसके लिए काम कर रही थी। इसका ‘रजाकार’ नामक सशस्त्र समूह था। वे हिन्दुओं पर खूब अत्याचार करते थे। कई मुसलमान तो लूटपाट के लालच में अन्य राज्यों से आकर इसमें भरती हो गये थे। वे हैदराबाद को पूरी तरह मुस्लिम राज्य बनाना चाहते थे।
रजाकार हैदराबाद की किसी भी बस्ती या निकटवर्ती गांव में जाकर लूटपाट और हत्या करने लगते थे। वे हिन्दुओं से ‘जजिया’ भी वसूल करते थे। हत्या से पहले वे कई लोगों का प्रमाण के रूप में अपने साथ फोटो खींचते थे। हिन्दू युवतियों का अपहरण और बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की कहीं कोई सुनवाई नहीं थी। 22 मई, 1948 को गंगापुर रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ी रोककर उसमें सवार हिन्दुओं पर हमला किया गया। इससे पूरे देश में निजाम के प्रति विरोध की भावनाएं भड़क उठीं; पर नेहरू जी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
आर्य समाज और हिन्दू महासभा ने हैदराबाद के भारत में विलय के लिए आंदोलन चलाया। डा. बर्गुला रामाकृष्ण राव इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे। पूरे देश से सत्याग्रही वहां आते थे। उन पर भी खूब अत्याचार किये गये। कई सत्याग्रही तो निजाम की जेल में ही मार दिये गये। आजादी मिले एक साल हो गया; पर निजाम के रुख में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
हैदराबाद के पास भैरनहल्ली नामक एक गांव था। रजाकार तीन बार यहां हमला कर चुके थे; पर ग्रामीण लोग रात भर जागकर पहरा देते थे। भेड़ बकरी चराने वाले चरवाहे उनके आने की सूचना गांव में पहुंचा देते थे। इससे गांव वाले कुल्हाड़ी, फरसे, तलवार, भाले, पत्थर, गुलेल आदि लेकर तैयार रहते थे। इससे रजाकारों को मुंह की खानी पड़ती थी। वे मौके की तलाश में थे।
27 अगस्त, 1948 को स्थानीय जनजातीय समाज का वार्षिक पर्व ‘बैठकुमा’ मनाया जा रहा था। लोग पूजा आदि में व्यस्त थे। इसका लाभ उठाकर रजाकारों तथा हैदराबाद स्टेट पुलिस ने वहां हमला कर दिया। उनके पास बंदूकें तथा छोटी तोपें भी थीं। ग्रामीण चौकीदारों को गोली मारकर घरों में आग लगा दी गयी। निहत्थे ग्रामीणों को एक जगह एकत्र कर लिया गया। फिर गोलियां बचाने के लिए एक साथ तीन लोगों को आगे पीछे खड़ाकर गोली मारी गयी। महिलाओं को निर्वस्त्र कर लाशों के सम्मुख नचाया गया। उनके गहने छीन लिये गये। कई महिलाओं ने कुएं में कूदकर अपनी लाज बचाई।
इस नरसंहार में लगभग 120 हिन्दू मारे गये। सैकड़ों लोग जीवन भर के लिए अपाहिज हो गये। सरदार पटेल को जब यह पता लगा, तो उन्होंने सितम्बर 1948 में ‘आॅपरेशन पोलो’ के अन्तर्गत पुलिस कार्यवाही की। भयभीत निजाम ने समर्पण कर दिया। कासिम रिजवी और निजाम का प्रधानमंत्री मीर लायक अली पाकिस्तान भाग गये। इस प्रकार सरदार पटेल के प्रयास से हैदराबाद रियासत भारत का अंग बनी तथा हिन्दुओं को अत्याचारों से मुक्ति मिली।