‘अगर हिंदू जागेगा तो दुनिया जागेगी’ – टोरंटो में सरसंघचालक मोहन भागवत का शक्तिशाली संदेश

VSK Telangana    31-Aug-2026
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कनाडा के टोरंटो में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय प्रवासियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत का उत्थान उसकी ताकत से नहीं, बल्कि एकजुट मानवता के लिए उसके योगदान से मापा जाना चाहिए। कार्यक्रम का नाम था ‘हिंदू विश्व बंधु-एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’। इसमें उन्होंने सेवा, विविधता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात कही।

इस कार्यक्रम का आयोजन कनाडियन हिंदूज फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग (CHORD) ने किया। इसमें कनाडा के आठ प्रांतों से 2,500 से ज्यादा हिंदू शामिल हुए। कनाडा के पूर्व रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी भी वहां थे। केनी ने कनाडा-भारत संबंधों में आई नई गति का स्वागत किया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल के अंत में कनाडा आ सकते हैं। उनके बयान पर लोगों ने ‘मोदी, मोदी’ के नारे लगाए। CHORD के आयोजक नरेश चावड़ा ने संख्या की पुष्टि की। कनाडाई रॉयल एयर फोर्स के पूर्व अधिकारी कार्तिक त्रिवेदी ने भी कार्यक्रम में शामिल होने के महत्व पर बात की।

भारत के उत्थान पर मोहन भागवत के विचार

इस अवसर, उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत प्रसिद्ध यात्री रहे ह्वेनसांग का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे वो भारत आया और फिर भारत के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की और फिर कनाडा वापस आया। ह्वेनसांग ने नालंदा के अपने तीन सहपाठियों के साथ नाव के जरिए ये यात्रा शुरू की। यात्रा शुरू करने के बाद उन्हें ये अहसास हुआ कि अगर लोड कम नहीं किया तो उनकी ये नाव डूब जाएगी। वो असल में पश्चिम की तरफ जा रहे थे। लेकिन, उस ज्ञान का फायदा किसे मिला, चीन को। इसी तरह सरसंघचालक जी ने द्वितीय विश्वयुद्ध का जिक्र करते हुए बताया कि उस दौरान पोलैंड में बहुत बड़ी तबाही हुई थी। तब भी वहां से रिफ्यूजी के तौर पर लोग भागकर भारत आए थे। तब भारत पर शासन कर रहे अंग्रेजों ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया था। लेकिन, जामनगर प्रिंसली स्टेट के राजा ने उन्हें बुलाकर शरण दी थी।

इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया, “अगर हिंदू जागेगा तो दुनिया जागेगी।” उन्होंने बताया कि भारत के ‘डीएनए’ में दूसरों की मदद करने की परंपरा है। उनके अनुसार, भारत का उत्थान मतलब अधिक एकजुट और अधिक स्वतंत्र मानवता है। उन्होंने कहा कि एक समय भारत को महाशक्ति कहा जा सकता था, लेकिन वह महाशक्ति नहीं था। उसने दुनिया की सेवा की और अपने चरित्र के कारण ‘विष्णु गुरु’ बना, महाशक्ति नहीं।

विविधता और वसुधैव कुटुंबकम

भागवत ने विविधता को भारत की एकता का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग चीजों को बाधा के रूप में नहीं देखा जाता। भारत की परंपरा लोगों को विविधता में एकता देखने की शिक्षा देती है और विविधता खुद एकता का रूप है। उन्होंने इसे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ से जोड़ा, जिसका मतलब है पूरी दुनिया एक परिवार है। इस विचार के तहत लोगों को बाहरी अंतर से आगे बढ़कर साझा मानवता को पहचानना चाहिए।

सेवा की भावना और पूर्वजों की यात्राएं

भागवत ने कहा कि सेवा की भावना भारत के चरित्र में गहराई से जुड़ी है। दुनिया में कहीं भी भारत से मदद मांगी गई तो उसने कभी इनकार नहीं किया। बिना मांगे भी मदद का हाथ बढ़ाया। उन्होंने पूर्वजों की यात्राओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि ज्ञान साझा करना था। पूर्वज मेक्सिको से साइबेरिया तक गए, हिमालय को पैदल पार कर चीन, साइबेरिया और मंगोलिया पहुंचे और छोटी नावों से दक्षिण-पूर्व एशिया गए। उन्होंने किसी देश पर विजय हासिल नहीं की और किसी को परिवर्तित नहीं किया।